कृष्ण जन्माष्टमी 2025 हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा, प्रेम और भक्ति से भरपूर होता है। इस पावन अवसर पर देशभर के मंदिरों को सजाया जाता है और रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

📅 कृष्ण जन्माष्टमी 2025 की तिथि और दिन
कृष्ण जन्माष्टमी 2025 को लेकर लोगों में उत्सुकता रहती है कि यह पर्व किस दिन मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, यह त्योहार 16 अगस्त 2025 (शनिवार) को मनाया जाएगा। यह दिन भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है, जो भगवान कृष्ण के जन्म का पावन समय माना जाता है।
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: 16 अगस्त 2025 को सुबह 09:24 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 17 अगस्त 2025 को प्रातः 10:12 बजे
- निशिता पूजा मुहूर्त (रात्रि पूजा): 16 अगस्त को रात 12:00 से 12:45 तक
🌙 जन्माष्टमी व्रत का महत्व
जन्माष्टमी का व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मसंयम, भक्ति और आत्मचिंतन का भी प्रतीक है। इस दिन उपवास रखने से आत्मिक शुद्धि होती है और व्यक्ति भगवान कृष्ण की कृपा का पात्र बनता है। कृष्ण जन्माष्टमी 2025 का व्रत विशेष रूप से मोक्ष और पुण्य प्राप्ति के लिए किया जाता है।
🔱 पूजन विधि और नियम
शुभ मुहूर्त में श्रीकृष्ण जन्म का पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। कृष्ण जन्माष्टमी 2025 के दिन पूजन विधि इस प्रकार है:
- स्नान और संकल्प: सुबह उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। व्रत और पूजा का संकल्प लें।
- मूर्ति स्थापना: भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या बाल गोपाल की प्रतिमा को पीले वस्त्रों में सजाएं।
- पंचामृत स्नान: श्रीकृष्ण को दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से स्नान कराएं।
- भोग अर्पण: माखन, मिश्री, फल, तुलसी पत्र और दूध से भोग लगाएं।
- आरती और भजन: रात्रि 12 बजे जन्मोत्सव मनाएं, आरती करें और ‘जय कन्हैया लाल की’ जैसे भजनों से वातावरण को भक्तिमय बनाएं।
🎉 देशभर में कैसे मनाई जाती है जन्माष्टमी
भारत के विभिन्न राज्यों में कृष्ण जन्माष्टमी 2025 को अलग-अलग अंदाज़ में मनाया जाएगा:
- मथुरा और वृंदावन: ये दो स्थान जन्माष्टमी की धूमधाम के लिए सबसे प्रसिद्ध हैं। यहां की लीलाएं और रास उत्सव विश्व प्रसिद्ध हैं।
- दही हांडी (महाराष्ट्र): मुंबई और अन्य शहरों में ‘गोविंदा’ की टोलियां दही हांडी फोड़ने की प्रतियोगिता में भाग लेंगी।
- गुजरात और राजस्थान: यहाँ मंदिरों में विशेष झांकियां सजाई जाती हैं और श्रीकृष्ण के जीवन की घटनाएं प्रस्तुत की जाती हैं।
🧘♀️ आध्यात्मिक दृष्टि से जन्माष्टमी का महत्व
कृष्ण जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह आत्मा के भीतर की दिव्यता के प्रकट होने का संकेत है। जब जीवन में अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की पुनः स्थापना के लिए चेतना का जागरण जरूरी होता है — यही संदेश श्रीकृष्ण का है। कृष्ण जन्माष्टमी 2025 हमें इसी गहराई से जोड़ती है(अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

श्रीकृष्ण जन्म कथा और पूजा विधि का महत्व
श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को आधी रात को हुआ था। माना जाता है कि जब कंस के अत्याचार चरम पर थे और अधर्म तेजी से बढ़ रहा था, तब भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना की। श्रीकृष्ण जन्म कथा हमें यह सिखाती है कि जब भी अन्याय और अधर्म बढ़ता है, तब ईश्वर स्वयं अवतार लेकर स्थिति को संतुलित करते हैं।
कृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं — इसका उत्तर न केवल धार्मिक, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह पर्व भगवान कृष्ण के दिव्य अवतार की स्मृति मात्र नहीं है, बल्कि उनके उपदेशों और जीवन के मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प भी है।
जन्माष्टमी पूजा विधि बहुत ही शुभ और पारंपरिक होती है। इस दिन भक्तगण व्रत रखते हैं, दिनभर उपवास करते हैं और रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म का उत्सव मनाते हैं। भगवान कृष्ण की मूर्ति को झूले में बैठाया जाता है, पंचामृत स्नान कराया जाता है, वस्त्र पहनाए जाते हैं और फिर आरती व भजन के साथ उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है। घरों और मंदिरों में झांकियाँ सजाई जाती हैं और श्रीकृष्ण जन्म कथा का पाठ होता है।
जन्माष्टमी शुभ मुहूर्त जानना पूजा की सिद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। वर्ष 2025 में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग एक अत्यंत पवित्र योग बना रहा है। यह योग रात्रि पूजा और व्रत पालन के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। जो भक्त इस मुहूर्त में उपवास व पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्य, संतान सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जानें कृष्ण जन्माष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, श्रीकृष्ण जन्म कथा और व्रत का महत्व। पूरी जानकारी एक ही स्थान पर।
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