परिचय
मानव जीवन का परम लक्ष्य क्या है? यह प्रश्न हर युग में साधकों और दार्शनिकों के लिए गहन चिंतन का विषय रहा है। वेदांत दर्शन और भगवद गीता का स्पष्ट उत्तर है – जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष है। मोक्ष का अर्थ है जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्त होना और आत्मा का परमात्मा में लीन हो जाना। यह स्थिति दुःख और बंधनों से परे, शाश्वत शांति और आनंद की अवस्था है।
भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ और काम – ये तीन पुरुषार्थ माने गए हैं, लेकिन उनका चरम लक्ष्य है चौथा पुरुषार्थ – मोक्ष। यही वह अंतिम उपलब्धि है जिसे पाकर आत्मा मुक्त हो जाती है।

मोक्ष का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ
“मोक्ष” शब्द संस्कृत धातु ‘मुच्’ से बना है, जिसका अर्थ है – “मुक्ति” या “छूट जाना”। मोक्ष का तात्पर्य है – अज्ञान, बंधन, इच्छाओं और पुनर्जन्म से मुक्ति।
- सांसारिक मोह से छूटकर आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है।
- वेदांत कहता है कि आत्मा शुद्ध, नित्य और अमर है। वह परम सत्य (ब्रह्म) का अंश है। जब आत्मा अपनी इस वास्तविकता को जान लेती है, तब उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
वेदांत दर्शन के अनुसार मोक्ष
वेदांत का मुख्य आधार है – “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात् ब्रह्म (परमात्मा) ही सत्य है और जीव उसी का अंश है। अज्ञान के कारण आत्मा स्वयं को शरीर और मन से जोड़ लेती है। यही बंधन और दुख का कारण है।
- ज्ञानमार्ग (ज्ञान योग) – वेदांत के अनुसार आत्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान ही मोक्ष का साधन है।
- आत्मबोध – जब साधक यह जान लेता है कि “मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, मैं आत्मा हूँ,” तब उसके सभी बंधन टूट जाते हैं।
- अविद्या का नाश – वेदांत कहता है कि अज्ञान (अविद्या) ही बंधन का कारण है। ज्ञान (विद्या) ही मोक्ष का कारण है।
गीता दर्शन के अनुसार मोक्ष
भगवद गीता जीवन का दार्शनिक मार्गदर्शक है। इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन, धर्म, आत्मा और परम सत्य का रहस्य बताया। गीता दर्शन के अनुसार –
- आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
- मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा अमर है।
- मनुष्य अपने कर्म और संकल्प से जीवन को बांधता है और वही बंधन उसे संसार में पुनर्जन्म की ओर ले जाता है।
गीता कहती है कि आत्मा का परम लक्ष्य है – ईश्वर में लीन हो जाना। श्रीकृष्ण कहते हैं – “मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।” अर्थात जो मुझे प्राप्त कर लेता है, उसे पुनर्जन्म नहीं होता। यही सच्चा मोक्ष है।
मोक्ष प्राप्ति के मार्ग (गीता और वेदांत अनुसार)
1. ज्ञान योग (ज्ञान का मार्ग)
- आत्मा और ब्रह्म की एकता का बोध।
- अहंकार और अज्ञान का नाश।
- सत्य और असत्य का विवेक।
2. भक्ति योग (भक्ति का मार्ग)
- ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण।
- श्रीकृष्ण कहते हैं – “भक्त्या मामभिजानाति” – केवल भक्ति से मुझे जाना जा सकता है।
- प्रेम और श्रद्धा से ईश्वर की प्राप्ति ही मोक्ष का मार्ग है।
3. कर्म योग (कर्म का मार्ग)
- निःस्वार्थ कर्म करना।
- गीता का उपदेश है – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”।
- कर्मफल की आसक्ति छोड़कर किए गए कर्म आत्मा को मुक्त करते हैं।
4. राजयोग (ध्यान का मार्ग)
- योग और ध्यान द्वारा चित्त को स्थिर करना।
- आत्मा को ईश्वर से जोड़ना।
- यह मार्ग वेदांत और पतंजलि योगसूत्र दोनों में मान्य है।
मोक्ष और जीवन की प्रासंगिकता
आज के समय में भी मोक्ष का महत्व कम नहीं हुआ है। भौतिक सुख, संपत्ति और प्रतिष्ठा होने के बावजूद मनुष्य अशांत रहता है।
- असली शांति बाहरी चीजों से नहीं, बल्कि भीतर से आती है।
- गीता दर्शन हमें सिखाता है कि आसक्ति, लोभ, अहंकार और क्रोध छोड़कर ही आत्मा शांति पा सकती है।
- मोक्ष केवल मृत्यु के बाद की अवस्था नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक ढंग भी है – मुक्त और शांत जीवन।
मोक्ष की राह में बाधाएँ
- अज्ञान और अहंकार।
- वासनाएँ और इच्छाएँ।
- कर्मों का बंधन।
- मोह-माया में फँसा मन।
गीता दर्शन स्पष्ट कहता है कि इनसे मुक्त हुए बिना मोक्ष की प्राप्ति असंभव है।
मोक्ष और पुनर्जन्म
भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा जन्म-जन्मांतर के चक्र में फँसी रहती है। जब तक कर्म शेष रहते हैं, तब तक आत्मा को पुनर्जन्म लेना पड़ता है।
- अच्छे कर्म स्वर्ग की ओर ले जाते हैं।
- बुरे कर्म नर्क या पुनः जन्म की ओर।
- लेकिन स्वर्ग और नर्क भी स्थायी नहीं हैं। केवल मोक्ष ही आत्मा की स्थायी मुक्ति है।
मोक्ष का आध्यात्मिक रहस्य
वेदांत और गीता दर्शन दोनों का मानना है कि आत्मा का असली स्वरूप आनंद है। लेकिन अज्ञान के कारण आत्मा स्वयं को सीमित मान बैठती है। जब साधक अपने भीतर छिपी चेतना को पहचान लेता है, तब वह बंधनों से मुक्त हो जाता है। यही मोक्ष की परम स्थिति है।
निष्कर्ष
मोक्ष भारतीय दर्शन का अंतिम लक्ष्य है। यह केवल मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाली अवस्था नहीं है, बल्कि जीवन में ही जीते-जी मुक्त होने का अनुभव है। वेदांत कहता है कि आत्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान ही मोक्ष है। गीता दर्शन कहता है कि भक्ति, ज्ञान और निःस्वार्थ कर्म से आत्मा ईश्वर तक पहुँच सकती है।
आज के भौतिक युग में भी मोक्ष की अवधारणा हमें याद दिलाती है कि जीवन का असली उद्देश्य केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति और शांति है।